कांग्रेस के लिए सीट बचाना बड़ी चुनौती

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जींद की तरह ही बरौदा विधानसभा का उपचुनाव कई राजनीतिक सवालों का जबाव देगा। भाजपा इस सीट पर गैर जाट कार्ड खेलेगी या फिर सरकार में अपनी सहयोगी जननायक जनता पार्टी के समन्वय से चुनाव लड़ेगी। और सबसे बड़ा सवाल यह कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा इस सीट पर अपना जलवा बरकरार रख पाएंगे या नहीं।
बरौदा विधानसभा सीट पर 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस के श्रीकृष्ण हुड्डा ने लगातार तीसरी बार कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज कर हैट्रिक बनाई थी। इससे पहले यह सीट इनेलो का गढ़ हुआ करती थी। लॉकडाउन के दौरान 12 अप्रैल को 74 वर्षीय हुड्डा का निधन हो गया। श्रीकृष्ण हुड्डा के निधन से खाली बरौदा सीट पर अगले छह माह में चुनाव होना है। ऐसे में राज्य में सक्रिय सभी राजनीतिक दलों की नजर इस सीट पर रहेगी। 2019 में इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, भाजपा और जजपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला था। हालांकि इस मुकाबले में श्रीकृष्ण हुड्डा ने भाजपा के योगेश्वर दत्त (ओलंपियन पहलवान) को 4840 मतों से हराया था। जजपा यहां तीसरे नंबर पर रही थी। यह उपचुनाव भाजपा के लिए जींद की तरह ही टॄनग प्वाइंट भी बन सकता है। यदि भाजपा जीती तो जीत के अलग मायने निकलकर आएंगे। सत्तासीन दोनों दल भाजपा-जजपा मिलकर संयुक्त प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारते हैं तो गठबंधन का आधार भी मजबूत होगा। वैसे जजपा के अलग चुनाव लड़ने का फिलहाल कोई कारण नहीं है मगर जजपा अलग चुनाव लड़ती है तो इस संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि गठबंधन के प्रत्याशी को हराने के लिए कांग्रेस अपने विरोधी दल इनेलो से समर्थन मांग ले और इनेलो भी उसका साथ दे दे। बरौदा उपचुनाव में कांग्रेस के सुरक्षित दुर्ग को बचाने की जिम्मेदारी पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर रहेगी। मगर 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा-जजपा गठजोड़ के बाद हुड्डा के सामने कई बड़ी चुनौती रहेंगी। हुड्डा के समख सबसे बड़ी चुनौती श्रीकृष्ण हुड्डा जैसा पंचायती उम्मीदवार खोजने की रहेगी। प्रत्याशी की खोजबीन में यह तथ्य भी अहम होगा कि इस बार वे फिर रोहतक से किसी नेता को बरौदा में उतारते हैं या फिर सोनीपत जिले के ही किसी सक्रिय नेता को उम्मीदवार बनवा पाते हैं।

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